ये 2018 का वर्ष चल रहा है. हिंदुस्तान में यह उत्साह का वर्ष होना चाहिए था. लेकिन यह वर्ष उन लोगों के लिए क्यों ऐसा वर्ष बन रहा है, जिनके ऊपर सबसे ज्यादा भरोसा था और अब उन्हीं का सबसे ज्यादा मजाक सोशल मीडिया पर उड़ रहा है. ऐसे में एक भारतीय कंपनी के प्रोडक्ट […]

प्रधानमंत्री मोदी इस मामले में सचमुच बहुत भाग्यशाली हैं कि उन्होंने देश में एक ऐसा समर्थक वर्ग तैयार कर लिया है, जिसकी आंखों पर सिर्फ और सिर्फ नरेंद्र मोदी का चश्मा है. उसे सरकार के किए गए वादे कभी याद नहीं आते. सरकार ने क्या-क्या काम किए, इसकी फेहरिस्त उन्हें याद नहीं है. सरकार के […]

कल्पेश याग्निक एक ऐसे पत्रकार थे, जो स्वयं में एक संस्था थे. कल्पेश याग्निक ने विश्वविद्यालय की खबरों से जिंदगी शुरू की और भास्कर जैसे हिंदी के प्रसिद्ध अखबार के ग्रुप एडिटर बने. कल्पेश याग्निक की आत्महत्या ने मनोवैज्ञानिक सवाल तो खड़े किए ही, संस्थान की निर्ममता पर भी कई सवाल खड़े किए. अब जब […]

अब देश को सीधे रास्ते पर चलना ही चाहिए. आखिर 70 सालों से यह देश गलत रास्ते पर चल रहा था. इन दिनों देश की जनता के दिमाग का पैमाना सोशल मीडिया है. इसे प्रधानमंत्री जी ने देश की मिजाज जानने का एक बैरोमीटर बना रखा है. दूसरी तरफ संघ प्रमुख मोहन भागवत जी के […]

नए-नए शब्द हमारे सामने आते रहते हैं. अब एक नया शब्द आया है, अर्बन नक्सलिज्म. इस शब्द को गढ़ने वाली एक महिला हैं, जो स्वयं हिंदू कोर्ट की स्वयंभू जज बनी हुई हैं. अभी तक किसी ने भी यह सवाल नहीं उठाया कि ये हिंदू कोर्ट क्या है और इसकी ये महिला सर्वोच्च जज कैसे […]

अगर सोशल मीडिया देश का दिमाग समझने का पैमाना है तो मान लेना चाहिए कि देश का दिमाग बदल गया है. सोशल मीडिया से मतलब फेसबुक, ट्‌वीटर और वाट्‌सअप पर चलने वाले संदेश हैं. पहले देश में माना जाता था कि जो वंचित हैं, जो गरीब हैं, जो सताए हुए हैं, जो निर्बल हैं, जो […]

श्री कुलदीप नैयर इस दुनिया को अलविदा कह गए. बहुत सारे लोगों ने कुलदीप नैयर को याद किया और उन्हें भरी आंखों से विदा किया. कुलदीप नैयर का जाना इतिहास के एक ऐसे अध्याय का बंद होना है, जो अध्याय जीवन के संघर्ष को, विचारधारा को, जनाभिमुख पत्रकारिता को और पत्रकारिता की शान को जीवित […]

अटल जी पिछले कई वर्षों से स्थितप्रज्ञ की अवस्था में थे. वे न बोलते थे न सुनते थे, बस उन्होंने जो जिया है, जो पाया है, जो करना चाहा और जो अधूरा रह गया शायद उसके बारे में अपने अंतर्मन में सोचते रहते होंगे. स्थितप्रज्ञ ऐसी अवस्था होती है, जिसमें व्यक्ति पूर्णतया बाहृय जगत से […]

हमारे देश में कुछ स्थितियां ऐसी बन जाती हैं जिनके पीछे कोई तर्क नहीं होता, लेकिन स्थितियां बन जाती हैं. जैसे, मैं जब से रिपोर्टिंग कर रहा हूं, देखता हूं कि अगर कहीं बड़ी डकैती की घटना हो जाती है, तो फिर अचानक डकैतियों से जुड़ी घटनाओं की बाढ़ आ जाती है. कहीं अगर बलात्कार […]

इन दिनों उन पत्रकारों पर शनि की साढ़े साती चल रही है, जो थोड़ा स्वतंत्र रूप से सोचते हैं. जो संस्थान पत्रकारिता से जुड़े हैं, चाहे वो अखबार निकाल रहे हों या न्यूज चैनल चला रहे हों, उनका पत्रकारिता के प्रति कमिटमेंट या उनकी निष्ठा संदेहास्पद तो नहीं है, लेकिन वे सवालों के दायरे में […]